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यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः। Shloka Meaning

यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम् ॥६॥

भावार्थ (Translation)

जिनकी माया के अधीन सम्पूर्ण जगत है
ब्रह्मा आदि देवता और असुर भी
जिनकी सत्ता से यह सारा संसार
असत्य होते हुए भी सत्य-सा प्रतीत होता है,
जैसे रस्सी में साँप का भ्रम होता है;
और जिनके चरण ही
संसार-रूपी महासागर को पार करने के इच्छुक लोगों के लिए
एकमात्र नौका हैं
उन समस्त कारणों से परे परम कारण,
राम नाम से प्रसिद्ध भगवान हरि को मैं नमन करता हूँ।


I bow to Lord Hari, known as Rama,
the supreme cause beyond all causes,
by whose Māyā the entire universe including Brahmā, gods, and demons, is governed;
by whose existence the unreal world appears real,
like the illusion of a snake in a rope;
and whose feet alone are the only boat
for those who wish to cross the ocean of worldly existence.

शब्दावली (Word Meanings)

शब्द (Word) अर्थ (Meaning)
यत् जिनका (whose)
माया माया, भ्रम-शक्ति (illusionary power)
वशवर्ति अधीन स्थित (under control)
विश्वम् जगत (universe)
अखिलम् सम्पूर्ण (entire)
ब्रह्मा ब्रह्मा (Brahmā)
आदि आदि, आदि से लेकर (and others)
देव देवता (gods)
असुरा असुर (demons)
सत्त्वात् सत्ता / अस्तित्व के कारण (by whose existence)
अमृषा असत्य (unreal)
इव के समान (as if)
भाति प्रतीत होता है (appears)
सकलम् सब कुछ (everything)
रज्जौ रस्सी में (in a rope)
यथा जैसे (just as)
अहेः साँप का (of a snake)
भ्रमः भ्रम (illusion)
पाद चरण (feet)
प्लवम् नौका (boat)
एकम् एकमात्र (only)
एव ही (alone)
हि निश्चय ही (indeed)
भव संसार (worldly existence)
अम्भोधेः समुद्र का (of the ocean)
तितीर्षावताम् पार जाना चाहने वालों के लिए (for those wishing to cross)
वन्दे वंदना करता हूँ (bow to)
अहम् मैं (I)
तम् उस (that)
अशेष समस्त (all)
परम् परे / सर्वोच्च (supreme, beyond)
रामाख्यम् राम नाम से प्रसिद्ध (known as Rama)
ईशम् ईश्वर (Lord)
हरिम् भगवान हरि / विष्णु (Lord Hari)

Sachin Verma's Editorial

इस श्लोक में गोस्वामी तुलसीदास जी मंगलाचरण के दर्शन-शिखर पर पहुँचते हैं। यहाँ राम किसी ऐतिहासिक नायक या केवल अवतार के रूप में नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व के आधार-तत्त्व के रूप में प्रकट होते हैं। ब्रह्मा से लेकर समस्त देवता और असुर, सब जिनकी माया के अधीन हैं - यह कथन भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि सृष्टि की गहन व्यवस्था को समझाने के लिए है। यहाँ सत्ता नहीं, सिद्धांत प्रधान है।

रस्सी में साँप के भ्रम का उदाहरण भारतीय दर्शन की सबसे सूक्ष्म उपलब्धियों में से एक है। भ्रम स्वयं में सत्य नहीं, पर वह शून्य से भी उत्पन्न नहीं होता। संसार भी ऐसा ही है, अनुभव में सत्य प्रतीत होता है, पर उसका अंतिम आधार रामतत्त्व है। तुलसीदास जी संसार को नकारते नहीं; वे उसकी सीमा स्पष्ट करते हैं। दुःख संसार से नहीं, भ्रम से उत्पन्न होता है।

व्यावहारिक रूप से यह श्लोक आज के मनुष्य की व्यथा को सीधे स्पर्श करता है। हम अस्थायी से स्थायित्व की अपेक्षा करते हैं, और उसी से थक जाते हैं। संसार एक महासागर है, यह तथ्य तुलसीदास जी स्वीकार करते हैं। पर महासागर को तैरकर नहीं, नौका से पार किया जाता है। वही नौका राम के चरण हैं, अर्थात् जीवन को धर्म, संतुलन और सत्य से जोड़ना।

आध्यात्मिक दृष्टि से यहाँ राम का अर्थ किसी संकीर्ण पहचान से नहीं, बल्कि जीवन-तत्त्व से है। जब चेतना राममूल्य से जुड़ जाती है, तब संसार बाधा नहीं रहता। राम के चरण भय का अंत हैं, पलायन नहीं।

साहित्यिक दृष्टि से यह श्लोक रामचरितमानस की अद्वितीयता का प्रमाण है। गूढ़ वेदान्त, माया-सिद्धांत, कारण-तत्त्व और भक्ति, सब कुछ सहज, प्रवाहपूर्ण भाषा में समाहित है। तुलसीदास जी दर्शन को भारी नहीं बनाते; वे उसे मानवीय बनाते हैं।

अंततः यह श्लोक सिखाता है कि मुक्ति संसार छोड़ने में नहीं, दृष्टि बदलने में है। जब भ्रम टूटता है, भय स्वतः मिट जाता है। जब राम के चरण थाम लिए जाते हैं, संसार-सागर भी मार्ग बन जाता है। यहाँ तुलसीदास जी वंदना नहीं, अनुभूति प्रकट करते हैं - और पाठक को उसी अनुभूति की ओर आमंत्रित करते हैं।